सोमवार, नवंबर 20, 2017

Me & My Mother

मेरी माताश्री श्रीमती डॉ. विद्यावती " मालविका "  हिन्दी साहित्य की विदुषी लेखिकाओं में अपना विशिष्ट स्थान रखती हैं। " बौद्ध धर्म पर मध्ययुगीन हिन्दी संत साहित्य का प्रभाव " विषय में पीएच.डी उपाधि प्राप्त डॉ. विद्यावती " मालविका "  की लगभग 40 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।

मेरी छः ग़ज़लें सामयिक सरस्वती में

प्रिय मित्रो, हिन्दी साहित्य जगत् की लोकप्रिय एवं महत्वपूर्ण पत्रिका ‘‘सामयिक सरस्वती’’ के अक्टूबर-दिसम्बर 2017 अंक में मेरी छः ग़ज़लें प्रकाशित हुई हैं।

शुक्रवार, नवंबर 10, 2017

Hello Everyone

सूर्य हुआ फिर उदित
प्रकृति हो गई मुदित
  
हो कब कैसे क्या - क्या
नहीं किसी को विदित
      .  🌞☀- डॉ. वर्षा सिंह

गुरुवार, नवंबर 02, 2017

तन्हाई

अंधेरों में बसी रहती
है तन्हाई ही तन्हाई
उजालों की कथाओं में
है परछाई ही परछाई
कहां जायें, कहें किससे
समझ में कुछ नहीं आता,
बड़ी मुश्किल हुई 'वर्षा'
नहीं कोई भी सुनवाई
       - डॉ. वर्षा सिंह

मंगलवार, अगस्त 22, 2017

साथी .....

चार दिनों का मेला, साथी
क्या-क्या हमने झेला, साथी
हरदम मात मिली क़िस्मत को
खेल समय ने खेला साथी
सपने अक़्सर बहा ले गया
मज़बूरी का रेला साथी
ख़ूब बटोरी शोहरत लेकिन
हाथ नहीं है धेला, साथी
एक अकेला तन्हा दिल है
"वर्षा" का अलबेला साथी
              - डॉ वर्षा सिंह

सोमवार, अगस्त 21, 2017

ख़्वाब हमारे अपने हैं....

दिल में डेरा डाले हैं ।
यादों के उजियाले हैं ।

हम तुम जब भी साथ हुए
पल वो बड़े निराले हैं ।

छोटे - छोटे लम्हे भी
बेहद ख़ुशियों वाले हैं ।

ख़्वाब हमारे अपने हैं
मिल जुल हमने पाले हैं ।

ग़म से "वर्षा" डरना क्या
ग़म तो देखे- भाले हैं ।

- डॉ वर्षा सिंह

गुरुवार, अगस्त 17, 2017

यादों के ठिकाने....

कभी सोते हुए
कभी जागते हुए
अचानक, अप्रयास
सामने आ जाती हैं
बीते हुए दिनों की कतरनें
                यादों के ठिकाने
                पता नहीं कहां- कहां होते हैं
- डॉ वर्षा सिंह

यादों के ठिकाने

कुछ लिफाफे
कुछ टिकटें
कुछ पुरानी चिट्ठियां
कुछ तस्वीरें
और कुछ डायरी के पन्ने
               यादों के ठिकाने
               पता नहीं कहां- कहां होते हैं

   - डॉ वर्षा सिंह

बुधवार, अगस्त 16, 2017

भीड़ है

हम जहां पर हैं वहां विज्ञापनों की भीड़ है।
मोहपाशी छद्म  के आयोजनों की भीड़ है।

अब नहीं पढ़ना सहज सम्पूर्णता से कुछ यहां,
मिथकथाओं की अपाहिज कतरनों की भीड़ है।

किस तरह से हो सकेगा सर्वजनहित का कलन,
व्यक्तिगत रेखागणित के गोपनों की भीड़ है ।

शब्द कैसे हों प्रतिष्ठित, आइए सोचें जरा,
व्यर्थ की संकेत बुनते मायनों की भीड़ है।

"रात है" कह कर नहीं हल हो सकेगा कुछ यहां ,
रोशनी लाओ, अंधेरे बंधनों की भीड़ है।

टूटती अवधारणायें सौंप जाती हैं चुभन,
हर कदम रखना संभलकर, फिसलनों की भीड़ है।

श्रावणी लय से न "वर्षा" हो कहीं जाना भ्रमित,
छल भरे सम्मोहनी संबोधनों की  भीड़ है।
           - डॉ वर्षा सिंह

मंगलवार, अगस्त 15, 2017

आज़ादी

संघर्षों के बाद मिली है आज़ादी
दिल की ले कर चाह पली है आज़ादी
हम भारत के लोग बढ़ाते क़दम जहां
परचम ले कर साथ चली है आज़ादी

- डॉ वर्षा सिंह

On this occasion of #IndependenceDay let us celebrate , Remember that #Freedom is not Free.

#Independenceday2017
#Independenceday2017India

Interview of Dr Vidyawati "Malvika"

प्रिय मित्रों,

आज "पत्रिका" समाचार पत्र के स्वतंत्रता दिवस अंक में  हिन्दी की वरिष्ठ साहित्यकार एवं मेरी माता जी डॉ. विद्यावती "मालविका" का साक्षात्कार प्रकाशित हुआ है... Please read & share.
धन्यवाद "पत्रिका" समाचार पत्र !!!!!

#पत्रिका
#साक्षात्कार #विद्यावती_मालविका #स्वतंत्रता_दिवस #IndependenceDay
#Senior_Author

शुक्रवार, जून 30, 2017

फूल खिले तो.....

फूल खिले तो पूरी दुनिया
जश्न मनाती लगती है
कोई अपना साथ चले तो
मंज़िल आती लगती है

यादों के उजियाले हैं

दिल में डेरा डाले हैं
यादों के उजियाले हैं

हम तुम जब भी साथ हुए
पल वो बड़े निराले हैं

छोटे - छोटे लम्हे भी
बेहद ख़ुशियों वाले हैं

ख़्वाब हमारे अपने हैं
मिल जुल हमने पाले हैं

ग़म से "वर्षा" डरना क्या
ग़म तो देखे- भाले हैं

सोमवार, मई 01, 2017

चुभ रही ख़ामोशियां, कुछ तो कहो

प्रिय मित्रो,
              मेरे ग़ज़ल संग्रह "वक़्त पढ़ रहा है"  से एक ग़ज़ल आप सब के लिए....
चुभ रही ख़ामोशियाँ कुछ तो कहो
उठ रही हैं, उंगलियां कुछ तो कहो
#वक़्त_पढ़_रहा_है

बुधवार, मार्च 08, 2017

Happy Women's Day

डॉ. वर्षा सिंह की ग़ज़ल -

सागर की लहर, झील का पानी हैं औरतें।
बहती  हुई  नदी  की   रवानी हैं औरतें।

दुनिया की हर मिसाल में शामिल हैं आज वे
‘लैला’ की, ‘हीर’ की जो कहानी  हैं औरतें।

उनका  लिखित स्वरूप  महाकाव्य की तरह
वेदों की ऋचाओं-सी  ज़ुबानी  हैं  औरतें।

मिलती हैं  जब कभी  वे  सहेली के रूप में
यादों  की  वादियों-सी  सुहानी  हैं औरतें।

‘मीरा’  बनी कभी,  तो ‘कमाली’  बनी कभी
‘वर्षा’  कहा  सभी  ने -‘दीवानी हैं औरतें’।
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